
Srila gurudeva—an embodiment of compassion
Sri guru inherits the power of compassion directly from the Supreme Personality of Godhead and descends to this earth enlivened with that power. Imbued with his own natural sweetness and beauty he is the manifested form of divine compassion, affection and grace for all. We cannot surmount the endless cycles of births and deaths and other miseries of the material world to attain absolute bliss without the grace of Sree guru.

“Therefore, without meandering to other forms of devotion, we should chant with one pointed focus while firmly believing in the oneness of the Name and Form of Supreme Lord Sri Krishna. If we can do so then there is no greater form of devotion that can provide us the promised results so quickly. There are thousands of different forms of devotion but chanting the Lord’s Name is the highest and foremost.”
His Divine Grace Srila Bhakti Dayita Madhav Goswami Maharaj.
(Founder Acharya – Sree Chaitanya Gaudiya Math)

श्रील भक्ति विकास ऋषिकेश गोस्वामी महाराज का आविर्भाव
10-Nov-2025
नमो ॐ विष्णुपादाय गौर प्रेष्ठाय भूतले।
श्रीमते भक्ति विकास ऋषिकेश गोस्वामी इति नामिने।।
बचपन से हीआपके जीवन में वैष्णव के सभी गुण दिखाई देते हैं। आपने अपने गुरुदेव श्रील भक्ति सिद्धांत सरस्वती गोस्वामी ठाकुर प्रभुपाद के नाम पर ही पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के रिषड़ा नामक स्थान पर श्री श्रीभक्ति सिद्धान्त गौडी़य मठ की स्थापना की। आप बंगला और हिंदी भाषा में हरिकथा एवं मधुर कीर्तन करते थे। आपने अनेक भव्य सभाओं में प्रभुपाद जी की हरिकथा का प्रचार किया। आपने कई भक्ति के गीत भी लिखे हैं।

अपनी साध्य वस्तु के प्रति सुदृढ़ निष्ठा अथवा प्रगाढ़ लोभ होने पर साधनकाल में धैर्य एवं सहिष्णुता का अभाव अवश्य ही दृष्ट होता है। जगत के साथ स्वयं को Adjust करके तथा परमार्थ पथ से लेशमात्र भी विच्युत नहीं होकर चलने की चेष्टा ही परमार्थ के अनुकूल है, ऐसा मेरा मानना है।
श्रीमद भक्तिदयित माधव गोस्वामी महाराज
जगाधरी, अम्बाला
29 नवम्बर,1954

गोपाष्टमी महा-महोत्सव
गाय, उनके बछड़े और बछडि़याँ भगवान श्रीकृष्ण को अत्यन्त प्रिय हैं। इस दिन विशेष रूप से गायों की पूजा की जाती है व उन्हें सजाया जाता है। इतना ही नहीं आज के दिन हरी घास के इलावा उन्हें अनेक प्रकार के व्यंजन भी खिलाए जाते हैं। अति बाललीला में गोपाष्टमी के दिन ही भगवान श्रीकृष्ण जी ने गाय के बछड़े-बछड़ियों को घास चराने की लीला प्रकाशित की थी। और बाद में जब कृष्ण किशोर अवस्था के हुए तो इसी कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि अर्थात गोपाष्टमी के दिन उन्होंने गाय के बच्चों की जगह गाय चराने की लीला प्रकाशित की, जिसे गोपाष्टमी उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

If there is mistake in determining the self, there will also be a mistake in the determination of the actual necessity of the self. If necessary ( goal of life ) is wrongly determined, the means to achieve it will also be wrong. So, all efforts will be futile. It is very essential to have clear and correct knowledge of self.

जो वास्तव में भगवान को चाहते हैं, उनका प्रथम कार्य है-दुःसंग का त्याग । दुःसंग या असत्संग का त्याग किये बिना साधुसंग नहीं होता । कृष्णसेवा के अतिरिक्त अन्य कामनाएँ ही दुःसंग है । शास्त्र कह रहे हैं- दुःसंग कहिये कैतव, आत्मवञ्चना। अर्थात् कृष्ण और कृष्णभक्ति के अतिरिक्त अन्य कामनाएँ दुःसंग हैं, जो कपट या आत्मवञ्चना है।

स्वेच्छानुसार चलने पर कर्ममार्ग में उद्वेग, दुःख, भय और अशांति ही रहेगी। किंतु शरणागति के पथ पर चलते हुए हम निश्चिंत होकर जीवन-यापन कर सकते हैं। शरण्य की इच्छानुसार चलने का प्रयत्न करना ही शरणागत का कर्त्तव्य है।

पापिष्ट व्यक्ति उतने पाप ही नहीं कर सकता जितने पाप एक हरिनाम हरण कर लेता है।
जब हरि के लिए नाम जप करें तब ही शुद्ध-हरिनाम होगा।
जो कोई भी मठ में वास की इच्छा करे, आकर रहना चाहे,उनके भजन में सहायता करना ही हमारा कर्त्तव्य है।

आत्मा का कारण परमात्मा है।
जीव कभी भगवान नहीं है।
नारायण शब्द का अर्थ ही होता है चेतन प्राणियों के समूह का आश्रय।
अणु आत्मा का कारण विभु आत्मा है।

Srila Guru Maharaj Ji has only increased the glory of his Guru Ji by not praising himself at any step. There is a saying that a true disciple is a true Guru, this saying fits perfectly on Shri Krishna Ballabh Brahmachari Ji i.e. the most revered Srila Bhakti Ballabh Tirtha Goswami Maharaj. The living proof of which is that this Shri Krishna Vallabh Brahmachari later became one of the great Vaishnav Acharyas of the world, a famous Vaishnavacharya, and the Guru of the entire world. You took over the Harinam preaching movement of your Guruji from national to international level.

The so called civilization of this world is a mere hypocrisy.If one act in a hypothetical manner, exhibiting grand external behaviour, then that is conciderd to be civilized in the Kaliyuga.

जो अपना जीवन वृथा ही व्यतीत करना चाहते हैं तथा स्वेच्छाचारी होकर ही चलना चाहते हैं,उन्हें सद्गुरु का चरणाश्रय ग्रहण करने की क्या आवश्यकता है।

जगद्गुरु श्रीवेदव्यास जी ने पद्मपुराण में हरिनाम करने के समय होने वाले अपराधों के बारे में विस्तृत रूप से बताया है।इन अपराधों को छोड़कर जो हरिनाम उच्चारण किया जाता है,उसे ही शुद्ध-हरिनाम कहते हैं।

When you take shelter to YOGMAYA, the internal potency. SITADEVI, you will get the service of supreme Lord by her Mercy.

भगवान को खुश करना ज्यादा कठिन नहीं है! हो सकता है स्त्री के लिए पति को खुश करना कठिन हो। पत्नी मेहनत करते हुए भी पति के दिल को जीत नहीं पाती है। पति भी मेहनत करते हुए भी पत्नी के दिल को जीत नहीं पाता है। पिता माता - पुत्र कन्या को खुश नहीं कर पाते हैं। पुत्र कन्या - पिता माता को खुश नहीं कर पाते हैं। दुनिया में ऐसा हो सकता है। लेकिन भगवान को ख़ुश करना कठिन नहीं है! मात्र दिल में सरलता रख कर, कपटता को छोड़कर, निष्कपट रूप से बोले - "प्रभु मैं बहुत छोटा हूँ। आपको भूल गया हूँ। मुझे क्षमा कीजिए। कृपा कीजिए।" तो भगवान प्रसन्न हो जाएँगे। भगवान का नाम करने से भगवान प्रसन्न हो जाएँगे। प्रसन्न करना ज्यादा कठिन नहीं है। कौन बोलता है कठिन है? नहीं है!

भगवान को प्रसन्न करना बहुत सहज है। बहुत कष्ट नहीं है। किसलिए? वह प्यारा है! यह सर्वत्र सिद्ध है। जिस प्रकार एक बच्चे के लिए अपने माता पिता को प्यार करना, सेवा करना, उनको खुश करना - मुश्किल नहीं होता है! उदाहरणार्थ - माता जी ने बच्चे को बिस्कुट दिया - बच्चा बिस्कुट खाने लगा, बिस्कुट में उसका बलगम लग गया और मिट्टी में गिर भी गया। वहाँ से उठाकर बच्चे ने वह बिस्कुट माता जी को दिया - "माता जी खा लो!" माता जी उसको भी खा लेती है। बच्चे को सुख देने के लिए!

We should remember the last teaching of the Bhagavad Gita, if our Guruji, our Thakurji is pleased with the dance & kirtan, then if we know to dance or not, if we want to dance or not, we should do dance & kirtan for the completion of wish of our guruji, vaishnavas and Thakurji.

भगवद गीता का आखिरी उपदेश हमें ये समझता है, अगर हमारे गुरुजी हमारे ठाकुरजी नृत्य कीर्तन से पसंद हो रहे हैं तो हमें चाहे नृत्य आता है, चाहे नहीं आता है, चाहे हमारा मन हो, चाहे नहीं हो गुरुजी की, वैष्णवो की, ठाकुर जी की प्रसन्नता के लिए नृत्य कीर्तन करना चाहिए।

हम लोग मुँह से तो भगवान का नाम लेते हैं और मन-मन में तमाम संसार के भोग पदार्थों को पाने की कामना रखते हैं। इस प्रकार लाख जन्म हरिनाम करने से भी भगवान की प्राप्ति या उनका प्रेम नहीं मिलेगा।

Supreme Lord Sri Hari is transdental. He is beyond mind, intelligence, and the sense organs of the conditioned souls of this world.

किसी जीव की सुकृतियाॅ बढ़ते -बढते जब अधिक मात्रा में एकत्रित हो जाती हैं,तभी उस जीव का भगवान में विश्वास होता है।

श्रीकृष्ण अवतार में बारहों रस परिपूर्ण रूप से प्रकाशित हैं। इसलिए श्रीकृष्ण का संग करने से हमें सब रस मिल सकते हैं।
''अमृत वर्षा।''

सब नाम संकीर्तनों में सर्वोत्तम नाम संकीर्तन है "हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।

The best name sankirtan among all name sankirtans is "Hare Krishna Hare Krishna Krishna Krishna Hare Hare, Hare Ram Hare Ram Ram Ram Hare Hare.

The essence of the entire Vedic literature, history is Srimad Bhagwatam and the essence of Shrimad Bhagwatam is Nam Sankirtan

Listening to Hari Katha pleases Mahaprabhu, Guruji also becomes happy and listening to this Hari Katha also saves us from the problematic circumstances of the material world.

हरी कथा सुन ने से महाप्रभु प्रसन्न होते हैं, गुरूजी भी प्रसन्न होते हैं और यह हरी कथा सुनना हमें संसार के चक्करों से भी बचाता है।

हमारा सौभाग्य है कि हमें ऐसी गुरु परंपरा मिली, अगर हम ठीक से भजन करें, हमें सर्वोत्तम वस्तु की प्राप्ति हो सकती है।

भगवान को मानना हर एक प्राणी का कर्तव्य है,हर एक का स्वार्थ है,हर एक का प्रयोजन है ।

God has appeared as his name.Yet,we can easily get Krishna in this Kaliyuga because the Lord has graced the fallen souls of this era and given them the easiest way.

जिस प्रकार श्रीभगवान की महिमा की कोई सीमा नहीं है,उसी प्रकार उन के नाम की महिमा की भी कोई सीमा नहीं है।नाम और नामी अभिन्न हैं।

भगवान के भक्त दुनियावी भोग व त्याग की और आकृष्ट नहीं होते।

चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि संसार में दो कार्य करें: स्वयं हरिनाम जपें और दूसरों को हरिनाम जपने के लिए प्रेरित करें।

Chaitanya Mahaprabhu says to do two tasks in this world, chant Harinam yourself and inspire others to chant Harinam.

जैसे हरि अनंत हैं और हरि कथा भी अनंत है, उसी प्रकार हमारे गुरुजी और परमगुरुजी की लीलाएं भी अनंत हैं।

अगर हम भगवान कृष्ण की प्रसन्नता के लिए, वैष्णवों की प्रसन्नता के लिए कृष्ण नाम करें, तो बहुत आसानी से हम भक्ति विनोद ठाकुर जैसे महान वैष्णवों का आशीर्वाद ले सकते हैं और कृष्ण प्रेम का रसास्वादान कर सकते हैं।

हर माता-पिता अपने बच्चों को धैर्य एवं सहनशीलता की शिक्षा अवश्य देनी चाहिए |

Human life is extremely rare; even the demigods long to attain a human birth. Ending this priceless human life over trivial matters is our greatest foolishness.

मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है; देवता भी मनुष्य जन्म पाने की आकांक्षा करते हैं, छोटी-छोटी बातों पर इस अमूल्य मानव जीवन का अंत करना हमारी सबसे बड़ी मूर्खता है।

श्री कृष्ण ही तमाम कारणों के कारण हैं और उनके साथ ही मेरा नित्य संबंध है।

वैष्णव संग तभी होता है जब भगवान की अत्यधिक कृपा होती है।

Vaishnav Association happens only when there is extreme grace of God.

मनुष्य जीवन परमार्थ प्राप्ति के लिए सुवर्ण सुयोग है।

गुरु, वैष्णव, भगवान के बारे में हमेशा सुनना चाहिए, लेकिन उनके प्रकट दिवस या तिरोभाव दिवस पर सुनना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

To surrender one's own will to the will of the Guru - whether one finds something agreeable or not - and to align oneself fully with their desire, this is what is truly called anugatya, or devoted obedience.

We should listen to Hari Katha everyday - whether the mind feels inclined or not, and whether we understand it fully or not.