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जीवन में शुद्ध भक्त का प्रवेश कैसे होता है  ?

जीवन में जब सौभाग्य जागृत होता है और भगवान की अहेतु की कृपा प्राप्त होती है, तभी हमें शुद्ध भक्त के दर्शन का अवसर मिलता है।
हम वेदों, पुराणों और अन्य ग्रंथों में शुद्ध भक्तों के लक्षणों का वर्णन पाते हैं, किंतु हमारे श्री चैतन्य गौड़ीय मठ के प्रतिष्ठाता आचार्य, परम पूज्यपाद त्रिदंडी स्वामी 108 श्री श्रीमद भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज जी ने अपने जीवनकाल की लीलाओं के माध्यम से हमें प्रत्यक्ष रूप में दिखाया कि शुद्ध वैष्णव कौन होता है।

एक समय की बात है — गुरुजी, अर्थात पूज्यपाद भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी और मंगल निलय प्रभु जी एक ग्रंथ के सिद्धांत पर चर्चा कर रहे थे।
मंगल निलय प्रभु जी एक अत्यंत विद्वान थे, जिन्हें शास्त्रों का गहरा ज्ञान था। चर्चा के दौरान दोनों के बीच थोड़ा मतभेद हो गया।
यह सुनकर परम गुरुजी स्वयं उनके कक्ष में आए।
परम गुरुजी ने गुरुजी से कहा — "तीर्थ महाराज, मंगल निलय प्रभु एक महान विद्वान हैं, आप उनसे वाद-विवाद न करें।"

और मंगल निलय प्रभु से कहा — "मंगल प्रभु, तीर्थ महाराज एक महान वैष्णव हैं, अतः आप भी उनसे वाद-विवाद न करें।"

एक और प्रसंग है — जब परम गुरुदेव अस्वस्थ लीला कर रहे थे।उस समय चंडीगढ़ से , हनुमान प्रसाद प्रभु जी परम गुरु महाराज से मिलने आए थे।
गुरुजी और हनुमान प्रसाद प्रभु, दोनों मिलकर परम गुरुजी की भजन-कुटी में प्रणाम करने गए और निवेदन किया कि कृपा कर हरिकथा सुनाएँ।

यद्यपि डॉक्टरों ने परम गुरुजी को अधिक बोलने से मना किया था, फिर भी उन्होंने गुरुजी के आग्रह पर सभी भक्तों को अपने कक्ष में बुलाया और कहा:-
"मुझे अस्पताल जाने की इच्छा नहीं है, परंतु वैष्णवों की आज्ञा से मुझे अस्पताल जाना पड़ रहा है।"

यहां असली कारण गुरुजी थे, क्योंकि उन्होंने बार-बार निवेदन कर परम गुरुजी से अस्पताल जाने का अनुरोध किया था।

परम गुरुजी ने अपने जीवन और व्यवहार से हमें यह दिखाया कि वास्तव में शुद्ध भक्त और शुद्ध वैष्णव कौन होते हैं।
यहाँ तक कि शरीर त्यागने से पूर्व भी उन्होंने घोषणा की थी:—

"गुरुजी — अर्थात भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी की बात सबको माननी ही पड़ेगी, चाहे वह छोटा हो या बड़ा।
जो स्वीकार करे वह यहाँ रहे, अन्यथा मठ छोड़कर चला जाए।"

श्रील प्रभुपाद जी के नित्य पार्षदों ने भी पहले से ही घोषणा कर दी थी कि गुरुजी बचपन से ही साधु स्वभाव के हैं और भविष्य के आचार्य होंगे।

चैतन्य महाप्रभु ने भी कहा है :—

"ब्रह्मांड भ्रमिते कौन भाग्यवान जीव
गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाए भक्ति-लता बीज।"

अर्थात — भगवान और गुरु की अहेतु की कृपा से ही हमें जीवन में शुद्ध वैष्णव अथवा सद्गुरु का मिलना संभव होता है।

स्वामी भक्ति विचार विष्णु महाराज जी