"विष्णु और वैष्णव ही हमारे सेव्य हैं। विष्णु और वैष्णवों की सेवा में से यदि केवल किसी एक की सेवा करना ही मेरे लिए सम्भवपर हो तो मैं वैष्णव का ही चयन करूँगा। यदि वैष्णवों की सेवा के लिए मुझे ऋण भी लेना पड़े तो भी मैं वैष्णव-सेवा से पश्चात्पद नहीं होऊँगा। उनकी सेवा के उद्देश्य से लिए गए ऋण को चुका पाने से पूर्व इस जगत् से चले जाने पर मैं पुनः अपने अगले जन्म में उस ऋण का शोधन करूँगा तथा आवश्यकता पड़ने पर पुनः ऋण लेकर नित्यंकाल के लिए वैष्णव-सेवा में अत्यन्त उत्साहपूर्वक रत रहूँगा। मेरी ऐसी चित्तवृत्ति सदैव बनी रहे। एक मुहूर्त के लिए भी मैं इस विचार से पतित ना होऊँ यही मेरी सदैव प्रार्थना रहे।"
श्री श्रीमद्भक्तिदयित माधव गोस्वामी महाराज