पहला, दुनियावी/सांसारिक फायदा है कि इस संसार में लोगों के इतने कष्ट हैं और कोई सुनने वाला नहीं । दुनिया के लोग सुनेंगे तो नमक ही लगाएंगे। किस से बात करें? किसी को तो बोलना है! तब जब भगवान के आगे बैठकर अपनी प्रॉब्लम, दुख बोलते हैं, उससे मन हल्का होता है। वरना हम पागल हो जाएँ। भगवान हैं जो हमारा दुख समझते हैं। वो हमारे अपने हैं।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव , त्वमेव बंधु च सखा त्वमेव।
वो हमारे असली माता-पिता हैं। जैसे माता-पिता अपने बच्चों के दर्द को समझते हैं, वैसे ही भगवान भी हमारा दर्द समझते हैं ।
दूसरी बात है कि, हर एक व्यक्ति भजन नहीं करता है। कुछ ऐसे लोग भी हैं जिनको भगवान से कुछ लेना देना ही नहीं है। ठीक उन नालायक बच्चों की तरह जिनके मां-बाप ने अनेक कष्ट करके उनको बड़ा किया और बड़े होकर वो अपने मां-बाप को पूछते ही नहीं हैं।
भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि कौन मेरा भजन करता है -
चतुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन ।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ।। 7.16।।
हे भरतश्रेष्ठ! चार प्रकार के पुण्यात्मा पुरुष मेरी भक्ति करने लगते हैं - दुःखी, धन के इच्छुक, जिज्ञासु तथा परमज्ञान की खोज करने वाले।
सुकृति - सु - अच्छा, श्याम सुंदर, सर्व सुंदर, कृति - कार्य। जो कार्य भगवान के लिए या उनके भक्त के लिए किया जाए, चाहे इच्छा से या अंजान से तो उससे सुकृति बनती है। सुकृति का बैंक बैलेंस अगर अच्छा हो तो भगवान की तरफ ध्यान जाता है, नहीं तो ध्यान ही नहीं जाता।
जब एक मंदिर बनेगा तो कोई प्रणाम करेगा, कोई झाड़ू लगाएगा, कोई भंडारे में सेवा देगा, कोई ठाकुर जी की ड्रेस में सेवा देगा! इन सब सेवाओं से उसकी सुकृति बनेगी और सुकृति बनेगी तो आगे जाकर वह भक्त बनेगा। जैसे खेत में बीज बोएंगे तब फसल होगी। अगर बीज ही नहीं बोयेगे तो फसल भी नहीं होगी।
फिर वहां उत्सव होंगे, नगर संकीर्तन निकलेगा तो कितने लोगों के कानों में भगवान का नाम जाएगा! उन सबकी भी सुकृति बनेगी उनका भी कल्याण होगा ।
अर्जुन भगवान से पूछते हैं
अयति: श्रद्धायोपेतो योगाचल्लित मानस:।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ 6.37 ॥
अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण! उस असफल योगी की क्या गति है, जो आरम्भ में तो श्रद्धापूर्वक आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया को अपनाता है, किन्तु बाद में सांसारिकता के कारण उससे विमुख हो जाता है और इस प्रकार रहस्यवाद में पूर्णता प्राप्त नहीं कर पाता?
एक व्यक्ति ने पढ़ाई अच्छी की, कैसे पता लगेगा? जब उसके अच्छे ग्रेड आयेंगे और अगली कक्षा में जाएगा। अगर कोई हर साल एक ही क्लास में रहे तो मतलब उसकी पढ़ाई अच्छी नहीं हुई, वो फेल हो गया। ठीक इसी तरह इस संसार की क्लास में मरना तो हम सबने है, लेकिन मरने के बाद वापिस यहीं जन्म हो गया तो मतलब भजन ठीक से नहीं हुआ हम फेल हो गए।
अर्जुन पूछते हैं कि प्रभु मान लीजिए कोई व्यक्ति भजन कर रहा था, लेकिन रिजल्ट अच्छा नहीं आया। मृत्यु के समय वो आपको याद नहीं कर सका उसका क्या होगा?
अब हमारे मठ के शिष्य ना प्याज लहसुन ना मीट खाते हैं, ना शराब पीते है, ना चाय ना सिगरेट पान करते हैं । सारा कुछ छोड़ दिया, हरिनाम किया। सारी जिंदगी खाया पिया भी नहीं और भगवद धाम भी नहीं जा सके - न माया मिली ना राम। इसके उत्तर में भगवान श्री कृष्ण कहते है, अर्जुन मैं अपने भक्त को इतना प्यार करता हूं कि मैं उसका कभी नुकसान नहीं होने देता। मेरी इस बात को नोट कर लो। जो मेरा भजन करता है, मैं उसकी कभी दुर्गति नहीं होने देता।
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति 6.40॥
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वती: समा:।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ 6.41 ॥
असफल योगी, पुण्यात्मा जीवों के लोकों में अनेक वर्षों तक भोग करने के पश्चात्, पुण्यात्माओं के परिवार में या धनी कुलीन परिवार में जन्म लेता है मरते समय उसका ध्यान इधर उधर गया तो मैं उसे वो चीज दे देता हूं और फिर उसको शुची यानी पवित्र घर में, किसी भगवद भक्त के घर में जन्म देता हूं, ताकि उसको सुयोग मिले भजन करने का।
और भगवान कहते हैं कि
अहं स्मरामि मद्भक्तम् नयामि परमां गतिम्
"यदि मेरा भक्त, मृत्यु के समय, किसी भी कारण से मेरा स्मरण करने में असमर्थ हो, तो मैं स्वयं उसका स्मरण करके उसे परम गति प्रदान करता हूं।"
गुरु महाराज जी बोलते हैं -
दुनिया में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं है, जो भगवान को ना चाहता हो! अगर कोई नास्तिक है, वो भी भगवान को चाहता है। इसके प्रूफ में गुरुदेव समझाते हैं, कि ऐसे नास्तिक व्यक्ति से बात करके पूछें कि तुम दुखी होना चाहते हो? वो कहेगा - "नहीं"। क्योंकि हर कोई सारा कुछ सुख प्राप्ति के लिए कर रहा है। फिर उससे पूछें - "क्या तुम बेफ़कूफ बने रहना चाहते हो?" "नहीं!" हर कोई ज्ञान चाहता है। फिर पूछें कि क्या तुम मरना चाहते हो? "नहीं!" हर कोई जिंदा रहना चाहता है! आत्महत्या करने वाला भी जिस समय छटपटाता है, उस समय बचना चाहता है ।
ऐसा नास्तिक भी सद यानि जिंदा रहने की इच्छा , चिद यानि ज्ञान की इच्छा, आनंद यानि सुखी रहने की इच्छा चाहता है। वास्तविक रूप में भगवान श्री कृष्ण ही सच्चिदानंद ( सद+ चिद+ आनन्द) हैं ।मंदिर हमें ऐसे सुअवसर देता है कि हम सुकृति कमा सकें और भगवान के घर, अपने असली घर जाने के रास्ते पर चल सकें।
रसिक भक्तों के लिए वो मंदिर में भगवान कोई मूर्ति नहीं हैं -
प्रतिमा नाह तुमि - साक्षात व्रजेंद्र-नंदन*।। च. च. मध्य 5.96।।
उनके दिव्य नेत्र हैं, भगवद अनुभूति है, वो भगवान से बात करते हैं, खिलाते हैं, विभिन्न प्रकार की लीला करते हैं।
एक मंदिर होने के या मंदिर बनाने के फायदे -
1 सांसारिक कष्ट से दिल हल्का करने के लिए और हम लोग पागल न हों, इसके लिए मंदिर होना जरूरी है।
2 सभी को सुकृति कमाने का मौका मिलता है, जिससे वो आगे जाकर अच्छे भक्त बन सकें।
3 उच्च कोटि के भक्तों के लिए लीला रसास्वादन।
स्वामी बी. वी. विष्णु
श्री चैतन्य गोडी़या मठ, कोलकता
29.06.2025