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श्री श्रीमद् भक्तिदयित माधव महाराज जी की एक लीला द्वारा महत्वपूर्ण शिक्षा

परम गुरुदेव श्रीनित्यलीलाप्रविष्ट ओम् विष्णुपाद परमहम्स 108 श्री श्रीमद् भक्तिदयित माधव गोस्वामी महाराज जी की एक लीला द्वारा महत्वपूर्ण शिक्षा

चैतन्य महाप्रभु की परम्परा में जब अंधकार का एक समय आया, तब अनेक प्रकार के अपसम्प्रदाय उत्पन्न हुए। ये लोग महाप्रभु का तिलक और कंठी तो धारण करते हैं, परंतु उनके आचरण को देखकर ऐसा लगता है मानो वे महाप्रभु की सम्प्रदाय के नाम पर कलंक हैं। चैतन्य चरितामृत में भी ऐसे अपसम्प्रदायो का उल्लेख मिलता है।

एक बार की घटना है – हमारे कोलकाता मठ में कथा-कीर्तन चल रहा था। उसी समय एक अपसम्प्रदाय का व्यक्ति भी मठ में आकर बैठ गया। किसी भक्त ने उसे पहचान लिया और सोचा कि यह अपसम्प्रदाय का है, इसलिए उसने उसे कथा से उठाकर बाहर भेज दिया।

हमारे परम गुरुदेव उस समय यह दृश्य देख रहे थे, लेकिन उन्होंने बीच सभा में कुछ नहीं कहा, न उस भक्त को डाँटा और न ही कोई आपत्ति जताई। वे मौन और धैर्य से बैठे रहे। उत्सव समाप्त होने के बाद, उन्होंने एक अन्य भक्त को बुलाकर कहा – “उस व्यक्ति को वापस ले आओ और उसे प्रसाद ग्रहण करने के लिए कहो।” तब वह व्यक्ति पुनः मठ में आकर बैठ गया।

बाद में, गुरुदेव ने उस भक्त को अपने कक्ष में बुलाया जिसने उस अपसम्प्रदाय के व्यक्ति को बाहर निकाला था। गुरुदेव ने पूछा – “तुमने उसे बीच उत्सव से क्यों उठाया?” उस भक्त ने उत्तर दिया – “क्योंकि वह तो अपसम्प्रदाय का था।”

तब गुरुदेव ने अत्यंत करुणा और गम्भीरता से कहा –

“ठीक है, वह अपसम्प्रदाय का है, परंतु जब वह कथा सुनेगा और अच्छे आचरण देखेगा तभी तो उसे अनुभव होगा कि उसका मार्ग गलत है। यदि हम उसे सुनने ही नहीं देंगे, सही आचरण देखने ही नहीं देंगे, तो उसे कैसे पता चलेगा कि सत्य क्या है और असत्य क्या है?

और फिर, यदि वह अपसम्प्रदाय का शिष्य है तो इसमें उसका क्या दोष है? हो सकता है कि उसके माता-पिता, दादा-दादी या परिवार के अन्य सदस्य उस अपसम्प्रदाय से दीक्षित रहे हों, और उसी परम्परा के अनुसार उसने भी दीक्षा ली हो। यह तो परिस्थिति की बात है, इसका अर्थ यह नहीं कि वह स्वयं दोषी है। इसलिए उसे अवसर दो कि वह सच्चाई देखे और सुने, तभी उसके मन में विचार आएगा – ‘मैं गलत हूँ।’”

इस प्रकार, परम गुरुदेव ने अपने आचरण से शिक्षा दी कि यदि कोई व्यक्ति गलत परम्परा, गलत गुरु या गलत आचरण वाला होकर भी मठ में आए, तो उसका अपमान न करो, बल्कि उसे सम्मान दो, अच्छे से बिठाओ और उत्तम व्यवहार करो। जब वह सही दर्शन और उत्तम आचरण देखेगा, तभी उसके हृदय में परिवर्तन होगा और उसे अनुभव होगा – “मैं गलत मार्ग पर हूँ।”

Swami B.V.vishnu