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हमारी महान गुरु परंपरा

हम सभी का बहुत सौभाग्य है , चाहे पिछली सुकृतियां हो या गुरु कृपा हो या अहेतुकी वैष्णव कृपा हो कि  हम बहुत अच्छी परंपरा में आ गए हैं । हम उस  परंपरा में हैं जहां अद्वैत आचार्य जी गंगाजल और तुलसी से भगवान को प्रकट कर देते हैं ।हम उस परंपरा में हैं जहां पर श्रील गौर किशोर दास बाबा जी महाराज हरि नाम करते हुए श्री बलराम जी से , श्री राधा कृष्ण जी से  उस प्रकार बातें करते हैं जिस प्रकार हम आपस में करते हैं। 

 हम उस परंपरा में हैं जहां पर श्रील जगन्नाथ दास बाबा जी महाराज जिनकी 110 साल की उम्र है, जिनका कई सालों से चलना फिरना नहीं हुआ,  उनका सेवक बिहारी दास उनको टोकरी में जहां कहीं कथा कीर्तन हो, वहां ले जाता है। लेकिन जिस दिन वह चैतन्य महाप्रभु के जन्म स्थान में जा रहे हैं - वहां पर उस समय कोई मंदिर भी नहीं है, उस जगह का नाम मायापुर भी नहीं मियांपुर है, जन्म स्थान के बगल में कब्रिस्तान बना है और जन्मस्थान पर खूब तुलसी जी के पेड़ हैं तो भक्ति विनोद ठाकुर जी वहां लोगों से पूछते कि यह तुलसी तुमने कैसे लगाई तुम सब तो मुस्लिम हो!  वे लोग कहते कि  हम यहां  धान लगाते हैं या कुछ भी लगाते हैं पर होती यही झाड़ी है इसीलिए हमने इस बंजर जमीन को छोड़ ही दिया। श्रील जगन्नाथ बाबा जी महाराज जो कई सालों से चले नहीं, जिनको उठा उठा कर ले जाया जाता है जो वृद्ध हैं, जब उस जगह को क्रॉस करते हैं तो अपने सेवक को कहते हैं - "मुझे उतारो!", और शीघ्रता में स्वयं छलांग लगाकर उतर जाते है और पांच सात हाथ उछल उछल कर, जय शच्चिनंदन गौर हरि बोलकर  नृत्य कीर्तन करने लगते है। 

हमारे चैतन्य महाप्रभु जी अपनी लीला में है , मुरारी गुप्त जी ने चैतन्य महाप्रभु जी को भोग लगाया गरम गरम चावल उसमें घी देकर। अगले दिन महाप्रभु जी स्वयं उनके घर आए और बोले, कल जो तुमने मुझे भोग लगाया, मेरा पेट खराब हो गया। मतलब हम उस परंपरा में हैं जहां पर वैष्णव भोग लगा रहे हैं और भगवान आकर खा रहे हैं। यह लीला उन्होंने इसलिए की ताकि हम जो उनके अनुगत जन हैं,  उनको पता लगे कि यह जो भोग लगाया जाता है, यह कोई ऐसे ही वैदिक क्रिया नहीं है बल्कि सच में भगवान स्वयं आते हैं और भोग पाते है लेकिन हम खिला नहीं पाते तो हमें लगता है शायद भगवान किसी का भी नहीं खाते , देखो मुरारी गुप्त जी ने खिलाया भगवान को। 

हम उस परंपरा से हैं जहां पर श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज, के प्रिय शिष्य के हृदय के उद्गार है कि मेरे पिताजी ने कभी भजन नहीं किया उनका श्राद्ध मेरे गुरुजी से हो जाए तो पिता जी का मंगल होगा , माधव महाराज उस समय कोलकाता में प्रोग्राम कर रहे हैं। अपने शिष्य के लिए माधव महाराज कोलकता में प्रवचन कर भी रहे हैं और उसी समय असम में 3:30 घंटा श्राद्ध की क्रिया भी कर रहे हैं,  हम इस महान परंपरा में हैं।

यही नहीं हम उस महान परंपरा से हैं जहां पर  हमारी माताओं बहनों ने भी बड़ा कमाल किया। जाह्नवा देवी, उन्होंने शिष्य भी बनाए, मंदिर भी बनाए ,विग्रह प्रतिष्ठा भी की, प्रचार भी किया। गंगा माता गोस्वामिनी, जिन्होंने विग्रह सेवा भी की और प्रचार भी किया। 

यहां तक की हमारी गौड़िया परंपरा के  बच्चे भी कमाल के हैं। रघुनंदन ठाकुर भगवान को भोग लगाते हैं, भगवान सिंहासन से उतरकर भोजन करते हैं। उनकी माता खाली थाली देखकर संदेह करती है कि थाली खाली कैसे हुई, पतिदेव के घर आने पर उनको सारी बात बताती है, वह दोनों सच जानने के लिए रघुनंदन को लड्डू का भोग लगाने को कहते है। पिताजी चुपके चुपके सब देखते है, बच्चा (रघुनंदन ठाकुर) सोचता है कि लड्डू के लिए आसन लगाने की थोड़ी न जरूरत है, लड्डू तो चलते-चलते ही खा लेते हैं तो रघुनंदन,  ठाकुर जी को कहते हैं -  "गोपीनाथ जी खाओ लड्डू!",  गोपीनाथ जी ने लड्डू लिया और खाने लगे, उनके पिताजी पर्दा खोल कर देखने लगे, गोपीनाथ जी ने आधा लड्डू खाया और आधा लड्डू वहीं रह गया।

 हम उस परंपरा से हैं जहां के बच्चे भी भगवान को खड़े-खड़े लड्डू खिला देते हैं! 

27 अप्रैल 2025
इस्कॉन चंडीगढ़
स्वामी बी. वी. विष्णु

हम उस परंपरा से हैं जहां पर परम आराध्य श्रील भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर प्रभुपाद जी ने 9.5 वर्ष एक जगह पर बैठ कर 100 करोड़ महामंत्र का संकल्प पूरा किया, जिसके बाद उन्हें पंच तत्व के दर्शन हुए और आदेश हुआ कि प्रचार करो। 

हम उस परंपरा से हैं जहां पर इस्कॉन के फाउंडर श्रील ऐ.सी. भक्ति वेदांत स्वामी प्रभुपाद 70+ की आयु में $2 भी जेब में नहीं है और अमेरिका की तरफ निकल पड़ते हैं। अपने जीवन में जिन्होंने पूरे विश्व को अकेले हिला कर रख दिया, 12 साल में 14 बार विश्व की परिक्रमा की और कितने जीवों को कृष्ण भक्ति में लगा दिया जिसकी कोई गिनती ही नहीं है । विवेकानंद जी एक निवेदिता को लेकर आए थे और उनका नाम इतिहास में आ गया लेकिन यहां पर एक नहीं कई निवेदिता आई और आती ही जा रही हैं।