आसाम के हाउली में एक विशाल धर्म-सभा हुई थी (१९४७) जिसमें हजारों हिन्दु व मुसलमान नर-नारी उपस्थित थे। प्रवचन के बीच एक मौलवी साहब ने श्रील महाराज जी(श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज जी)को एक प्रश्न किया. "क्या आत्मा-परमात्मा को किसी ने देखा है? आप आत्मा-परमात्मा की बात कहकर दुनिया के लोगों को धोखा नहीं दे रहे हैं, उसका प्रमाण क्या है?"
मौलवी साहब का प्रश्न सभा के नियम के विरुद्ध था, इसलिये उनके प्रश्न से श्रोता नाराज़ हो गये और उन्होंने श्रील महाराज जी को प्रश्न का उत्तर देने के लिए मना कर दिया। परन्तु उक्त प्रश्न का उत्तर न देने से कदाचित् अज्ञ व्यक्ति यह समझें कि इसका उत्तर है ही नहीं, इसलिए श्रील महाराज जी ने सभा में ही मौलवी साहब के प्रश्न का उत्तर दिया।
मौलवी साहब के हाथ में एक पुस्तक थी। श्रील महाराज जी ने मौलवी साहब को पूछा- "आपके हाथ में जो पुस्तक है, उसका नाम क्या है?"मौलवी साहब पुस्तक को किताब कहते हैं व किताब का नाम बताते हैं।
श्रील महाराज जी ने कहा, "बंगला, आसामी, हिन्दी तथा अंग्रेज़ी इत्यादि भाषाओं का ज्ञान व आँखे ठीक होने पर भी मैं उस किताब का वह नाम नहीं देख पा रहा हूँ, क्यों? मौलवी साहब मुझे धोखा नहीं दे रहे हैं, इसका क्या प्रमाण है?"
श्रील महाराज जी के प्रश्न को सुनकर मौलवी साहब के आसपास जो लोग बैठे थे उन्होंने भी किताब को अच्छी तरह से देखा और श्रील महाराज से कहा कि मौलवी साहब किताब का जो नाम बता रहे हैं, वह ठीक है।
इसके उत्तर में श्रील महाराज जी ने कहा कि आप सब लोग एक साथ मिलकर मुझे धोखा दे रहे हैं।
मौलवी साहब कुछ आश्चर्यचकित हुये और उन्होंने जानना चाहा कि श्रील महाराज जी क्या देख रहे हैं व उनके इस प्रकार बोलने का अभिप्राय क्या है?
तो श्रील महाराज जी ने कहा कि, "मैं तो देखता हूँ कि एक कौवा स्याही पर बैठा होगा। बाद में वही आपकी इस किताब के ऊपर बैठ गया होगा, ये उसी के पैरों के निशान हैं।"
श्रील महाराज जी के इस प्रकार के मंतव्य को सुन कर मौलवी साहब ने कहा कि आप निश्चय ही उर्दू नहीं जानते ।
श्रील महाराज जी ने स्वीकार किया कि हाँ, मैं उर्दू नहीं जानता हूँ।
मौलवी साहब ने कहा, "तब आप उर्दू लेख को कैसे समझ पायेंगे? आपको उर्दू सीखनी होगी। तब आप भी देख पाओगे कि इस किताब का नाम वही है जो मैं बता रहा हूँ।"
श्रील महाराज जी ने मौलवी साहब की बात पर ही उनको समझाते हुए कहा, "बहुत सी भाषाएँ जानते हुए भी, बहुत सा ज्ञान होने पर भी, उर्दू भाषा को समझने के लिये उर्दू का ज्ञान आवश्यक है। आँखों की दृष्टि शक्ति ठीक रहने पर भी, उर्दू का ज्ञान न रहने पर उर्दू भाषा के शब्द के रुप को व अर्थ को समझा नहीं जा सकता, देखा नहीं जा सकता। उसी प्रकार दुनियादारी की बहुत सी अभिज्ञता (ज्ञान) व योग्यता रहने पर भी, आत्मा वा परमात्मा को समझने की विशेष योग्यता जब तक अर्जित नहीं हो जाती, तब तक आत्मा व परमात्मा की अनुभूति नहीं होती।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
संदर्भ: संशय छेदन