श्रीगुरु महाराज जी ने साधन भक्ति के बारे में बताते हुए कहा कि बद्धावस्था (अर्थात् जब जीव संसार में फँसा रहता है) में जीव के अन्दर चार प्रकार के अनर्थ होते हैं जो कि साधन-अवस्था तक रहते हैं। परन्तु वैष्णव आनुगत्य में लगातार साधन करते रहने से साधक के सारे अनर्थ समाप्त हो जाते हैं।
अनर्थ दूर हो जाने पर साधक का चित्त अपने आराध्यदेव के चरणों में उनकी भक्ति में निश्चित रूप से स्थित हो जाता है। ऐसी अवस्था में चित्त की चंचलता बिल्कुल समाप्त हो जाती है भगवद्-भजन में निष्ठा हो जाने के बाद यदि साधु-संग अधिक प्रयत्न के साथ चलता रहे तो भजन-निष्ठा के साथ-साथ भजनकारी के हृदय में भजन करने के लिए उल्लास होता है। भजन में उल्लास के भाव से युक्त भजन में होने वाली निष्ठा का नाम ही "रुचि" है। जीव की जैसे-जैसे भजन में रुचि बढ़ती जाती है, ठीक, वैसे-वैसे ही उसकी कृष्णेतर विषय-भोगों में रुचि घटती जाती है। इसके बाद नम्बर आता है आसक्ति का अर्थात् हरिभजन में रुचि पैदा होने पर जीव के हृदय से जब अनर्थ अधिकांश रूप से दूर हो जाते हैं, तब हरि-भजन में आग्रह युक्त रुचि को ही आसक्ति कहते हैं। इस स्थिति में पहुंचने पर जीव की सारी क्रियायें सिर्फ भक्त और भगवान को प्रसन्न करने के लिए ही होती हैं। उसे छटपटाहट सी होती है। भगवद्-भजन के लिए ऐसी स्थिति में पहुंचे।
जीव का जीवन कृत-कृत्य हो जाता है। बस यहीं तक जीव को साधन करना पड़ता है। आसक्ति के परिपक्व हो जाने से, ये आसक्ति ही फिर भाव, रति या प्रेमांक कहलाती है। इस भावावस्था में पहुंचने पर जीव का चित्त द्रवित हो जाता है और जब जीव के हृदय के यह भाव अपने इष्टदेव में अनन्य-ममता को प्राप्त होते हैं तो यह भाव ही “प्रेम” कहलाता है, जो कि जीव के हृदय का परम व चरम लक्ष्य है। जीव की यह अवस्था ही सर्वोच्च अवस्था है। इस अवस्था में पहुंचे जीव को धर्म, अर्थ, काम तो क्या, चारों प्रकार की मुक्ति भी अत्यन्त तुच्छ व घृणित सी प्रतीत होती है।
श्री मद् भक्तिदयित माधव गोस्वामी महाराज