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मैं कौन हूँ?

मैं श्रीकृष्ण की शक्ति का अंश हूँ। मुझमें भी सद्, चिद् और आनन्द के ये तीनों भाव विद्यमान हैं किन्तु मैं वस्तु-तत्त्व नहीं हूँ। स्वभावगत सद्, चिद् और आनन्द होने को कारण श्रीकृष्ण के साथ ही मेरा नित्य सम्बन्ध है।  क्या सम्बन्ध है? अर्थात् मेरा श्रीकृष्ण से क्या सम्बन्ध है? मेरे सब प्रकार के सम्बन्ध श्रीकृष्ण के साथ ही हैं। उनकी दो प्रकार की शक्तियाँ हैं-परा और अपरा। मुझमें कारण रूप से जो चिद् सत्ता विद्यमान है वह श्रीकृष्ण की परा शक्ति का अंश है। मेरा ये बाहरी शरीर एवं सूक्ष्म शरीर श्रीकृष्ण की अपरा शक्ति का अंश है। मैंने अपने आपको हर प्रकार से उनका समझकर, हर समय उनके भजन में लगे रहने के अभिप्राय से ही संसार छोड़ा है। श्रीकृष्ण के साथ ही मेरी स्थूल देह, सूक्ष्म देह और उनकी कारण आत्मा का सम्बन्ध है। मेरी सारी इन्द्रियाँ सदा श्रीकृष्ण की सेवा करें, यही मेरा भजन है।

क्या मैं संसार में अर्थात् गृहस्थ में रहता हुआ भजन नहीं कर सकता था? हाँ, कर सकता था, किन्तु संसार में रहकर संसार के श्रीकृष्ण-विमुख व्यक्तियों के रुचिकर कार्य न करने से उनके बीच में रहना सुखकर न होता। जबकि मैं अपने इस अमूल्य जीवन का एक क्षण भी श्रीकृष्ण भजन के अतिरिक्त कार्यो में लगाकर इस जीवन को व्यर्थ नहीं करना चाहता। 
मैंने अपनी विभिन्न इन्द्रियों को नाना प्रकार से श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिए नियोजित रखने का सुअवसर प्राप्त करने के लिए ही परम करुणामय एवं स्नेह की खान महाप्रभु जी के सेवक-विग्रह (श्रीगुरुदेव) का संग प्राप्त किया है। उन्होंने स्नेहवश मेरी अयोग्यताओं की ओर ध्यान न देकर, मेरी भजन - लालसा को समृद्ध करने के लिए  मुझे अपने सेवक के रूप में अंगीकार किया है। उनकी कृपा-स्पर्श से और भी उत्साहित होकर मैंने सब इन्द्रियों द्वारा अनन्य रूप से श्रीकृष्ण भजन करने का संकल्प ग्रहण किया है।


श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
संदर्भ :मेरा भजन।