भगवान सच्चिदानन्द स्वरूप हैं। भगवान और उनके नाम में कोई भेद नहीं है। हम सब नाम का संग प्राप्त कर सकते हैं। नाम का संग नाम के श्रवण, कीर्तन, स्मरण द्वारा हो सकता है। इसलिए शास्त्रों में कलियुग के लिए प्रधान रूप से नाम-भजन का ही उपदेश दिया है।
मनुष्यों का दिल विषयाविष्ट (विषयों की ओर खिंचा हुआ) होने से कलियुग में ध्यान सम्भव नहीं है। ध्यान करने बैठते हैं भगवान् का, परन्तु आ जाती है विषय-चिन्ता । जिस विषय की चिन्ता से पहले ही दिल भरा पड़ा है। वही चिन्ता ध्यान के समय आ जाती है। इस लिए ध्यान सम्भव नहीं होता। जिसके भीतर हजारों प्रकार के भाव भरे पड़े हैं, जिसके हजारों धन्धे हैं, चित्त की चंचलता के कारण उसका ध्यान सम्भव नहीं हो सकता। कलियुग में यज्ञ भी सम्भव नहीं है। क्योंकि अजितेन्द्रिय व्यक्ति शुद्ध रूप से वेद आदि मन्त्र भी उच्चारण नहीं कर सकता। मन्त्र उल्टा-पुलटा पढने से फल भी उल्टा हो जाता है। यज्ञ के लिए शुद्ध द्रव्य (सामग्री) चाहिए, परन्तु कलियुग में शुद्ध द्रव्य नहीं मिलता। एक तो शुद्ध द्रव्य का अभाव, दूसरा अजितेन्दियता के कारण वैदिक मन्त्र शुद्ध उच्चारण करने की अयोग्यता! इन दोनों मुख्य कारणों से कलियुग में यज्ञ ठीक प्रकार से नहीं हो सकता। वर्तमान समय में परिचर्या या अर्चन द्वारा भी भगवद् प्राप्ति नहीं हो सकती। कारण ? हर समय ही बीमारी है। बीमार अवस्था में सेवा नहीं हो सकती। बीमार होने से सेवा का अधिकार नष्ट हो जाता है। व्याधिग्रस्त व्यक्ति अर्चन या परिचर्या नहीं कर सकते। सतयुग में जीव ध्यान द्वारा भगवद् प्राप्ति कर लेते थे। त्रेता युग में यज्ञ आदि द्वारा तथा द्वापर युग में परिचर्या या अर्चन द्वारा भगवद् प्राप्ति कर लेते थे। परन्तु अभी कलियुग में ध्यान, यज्ञ, अर्चन इन में से एक भी नहीं हो सकता। अभी क्या करना चाहिए ?शास्त्र में कहते हैं :-
। हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम् ।
।। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ।।
हरिनाम, हरिनाम, हरिनाम ही केवल गति है। कलियुग में इसके बिना निश्चय ही गति नहीं है, नहीं है, नहीं है।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
संदर्भ: अमृत वर्षा ।