ग्रंथेर आरंभ करी मंगलाचरण! ग्रंथ के पहले मंगलाचरण करो। गुरु, वैष्णव भगवान तीनेर स्मरण! तीनों को स्मरण करना, याद करना! ऐसा नहीं कि अभी याद किया और फिर भूल गए। फिर नहीं होगा! अर्थात् वास्तविक फल प्राप्त नहीं होगा। गुरु की कृपा के बिना कोई भी वस्तु मिलती नहीं! जो गुरु को नहीं मानता, उनमें विश्वास नहीं रखता, वह कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता है! जो वैष्णव में श्रद्धा विश्वास नहीं रखता अर्थात उनको नहीं मानता वह भी कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता! और इसी प्रकार जो भगवान को नहीं मानता अर्थात् उनमें श्रद्धा और विश्वास नहीं रखता उसे कुछ भी उपलब्धि नहीं हो सकती है! हमें हृदय से तीनों को अर्थात् गुरु, वैष्णव एवं भगवान को स्मरण करना चाहिए। किसी भी क्षण हम मृत्यु को प्राप्त हो सकते हैं। हमारे साथ क्या जाएगा? जब हम मर जाएंगे, हमारे साथ क्या जाएगा? किसी भी क्षण हम मर सकते हैं। इसलिए हमें सदा सावधान रहना चाहिए। जब हमारी प्राकृत इन्द्रियां रहती हैं तब हम मात्र प्राकृत वस्तुओं का दर्शन कर सकते हैं। इन प्राकृत इंद्रियों से अप्राकृत वस्तु भगवान तथा भगवान के भक्तों के दर्शन नहीं कर सकते हैं। यह इतना सरल नहीं है! इसलिए हमें अत्यंत सतर्क रहने की आवश्यकता है! अत्यंत सतर्क! हमारे साथ हमारी मृत्यु के समय कुछ भी सांसारिक वस्तु नहीं जाएगी। फिर क्या कीमत है इनकी? बाह्य रूप से यह सब अत्यंत विलासमय दिखती हैं। जब हम गंभीरता पूर्वक इन वचनों को चिंतन मनन करके आचरण में लाएंगे तब हमें सब कुछ प्राप्त हो जाएगा। इसमें कोई शंका नहीं है! इसलिए कहते हैं - *"अनायास हय निज अभिष्ट पूर्ण"*। जब हम गंभीरतापूर्वक इन वचनों को चिंतन मनन करके आचरण में लाएँगे, तब हमें सब कुछ प्राप्त हो जाएगा। इसमें कोई शंका नहीं है।
अतः श्री कृष्ण नामादि न भवेत् ग्राह्यं इन्द्रियैः।
सेवा-उन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयं एव स्फुरति अद:।।
श्रील रूप गोस्वामी द्वारा रचित भक्तिरसामृत सिंधु में यह वचन है। श्री कृष्ण - नाम रूप गुण लीला - जितनी भी हैं, ये हमारे प्राकृत इंद्रियों द्वारा ग्राह्य वस्तु नहीं है! हम प्राकृत इंद्रियों को अत्यधिक महत्ता देते हैं। किन्तु वह सारा समय, हमें नष्ट ही समझना चाहिए। इससे कुछ भी नहीं होगा! अप्राकृत वस्तु भगवान - उनको हम इन जड़ अथवा प्राकृत इंद्रियों द्वारा नहीं समझ सकते हैं। तो हमें यह समझने की आवश्यकता है कि मूल में क्या है! हमें इस अवसर को गंवाना नहीं चाहिए। मेरे परमआराध्यतम श्रील गुरुदेव नित्यलीला प्रविष्ट ओम 108 श्री श्रीमद्भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज ने अपने शिष्यों के निकट यही शिक्षा दी- "तुम्हें और कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है! श्रील भक्ति विनोद ठाकुर आविर्भूत हुए, श्रील भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर आविर्भूत हुए। अब मात्र इनकी शिक्षाओं को पालन करना है। उनकी वाणी का अनेक भाषाओं में अनुवाद करके प्रचार करने से हमारा सर्वोत्तम मंगल लाभ होगा।"
यह मनुष्य जीवन अनेक अनेक योनियों के उपरांत प्राप्त हुआ है।
जलजा नव लक्षाणी, स्थावर लक्ष विम्शति, कृमयो रूद्र संख्यक:।
पक्षिणाम दश लक्षणं, त्रिन्शल लक्षानी पशव:, चतुर लक्षाणी मानव:।।
(78:5 पद्मपुराण)
यह मनुष्य जीवन सरलता से प्राप्त नहीं होता! लाखों जन्मों के बाद कहीं जाकर यह मनुष्य जीवन लाभ होता है। इसे व्यर्थ मत गँवाओ। इन्द्रिय भोग के लिए इसे व्यर्थ मत गंवाओ! यह जन्म अत्यंत दुर्लभ है।
लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते
मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीर: ।
यह मनुष्य जीवन जहाँ एक ओर क्षणभंगुर है, वहीं दूसरी ओर इसी जीवन में सर्वोत्तम परमार्थ की उपलब्धि भी संभव है।
कौमार आचरेत्प्राज्ञो धर्मान्भागवतानिह ।
दुर्लभं मानुषं जन्म तदप्यध्रुवमर्थदम् ॥ १ ॥
(श्रीमद् भागवतम् 7.6.1)
इसलिए इससे पहले की मृत्यु सन्निकट आ जाए इस अवधि को सर्वोत्तम परमार्थ के लिए नियोजित कर देना चाहिए।
लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते
मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीर: ।
तूर्णं यतेत न पतेदनुमृत्यु याव-
न्नि:श्रेयसाय विषय: खलु सर्वत: स्यात् ॥ २९ ॥
(श्रीमद् भागवतम् 11.9.29)
क्षण मात्र का भी विलंब नहीं करना चाहिए। अपने परमार्थ के लिए हमें इस मनुष्य जीवन में प्रयासशील होना चाहिए। जड़ इंद्रिय भोग तो जीव को अर्थात आत्मा को प्रत्येक योनि में ही सुलभ है।
न्नि:श्रेयसाय विषय: खलु सर्वत: स्यात्
उदाहरणार्थ आहार, निद्रा, भय और मैथुन तो कुत्ते, सूअर, घोड़ा, पक्षी, मछली आदि सभी शरीरों में उपलब्ध है।
एक राजा थे भरत और बाद में वे जड़ भरत के रूप में भी आए। जब वही भरत महाराज का हिरण की योनि में जन्म हुआ तो उन्हें अपने पूर्व जन्म का स्मरण था। उस हिरण जीवन में उन्होंने अन्य हिरणों का संग नहीं किया। अगले जीवन में वे भगवद भक्त हुए। अतः हमें अत्यंत सावधान रहने की आवश्यकता है। जब भरत महाराज के समान भक्त को भी हिरण योनि में जन्म लेना पड़ सकता है, तो हम लोगों के विषय में तो कहना ही क्या! इसलिए अत्यंत अत्यंत सावधानी की आवश्यकता है! श्रीमन् चैतन्य महाप्रभु ने इस जगत में आविर्भूत होकर हम पर असीम कृपा करी है। उनकी कृपा हम कैसे प्राप्त कर सकते हैं? पंचतत्व और हरे कृष्ण महामन्त्र का जप करके!
श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानंद श्री अद्वैत गदाधर श्रीवास आदि गौर भक्त वृन्द।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे।।
Youtube video - Srila Tirtha Maharaj Speaks Wonderful Harikatha.
On the occasion of his 50th sanyas anniversary at sridham mayapur on 14th march 2011