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शास्त्रों में श्रीभगवान के दो स्वरूपों का वर्णन है एक वाच्य और दूसरा वाचक।

। वाच्यं वाचकमित्युऽदेति भवतो नाम स्वरूपद्वयं, पूर्वस्मात् परमेव हन्त करुणं तत्रापि जानीमहे ।
।। यस्तस्मिन् विहितापराधनिवहः प्राणी समन्तादभवे, दास्येनेदमुपास्य सोऽपि हि सदानन्दान्बुधौ मज्जति।।

हे नाम ! आपका एक स्वरूप 'वाच्य' अर्थात् विभुचैतन्य और आनन्दमय विग्रह है और दूसरा स्वरूप "वाचक” अर्थात् कृष्ण, गोविन्द इत्यादि वर्णात्मक है। लेकिन मैं "वाचक स्वरूप" को अधिक कृपामय जानता हूँ। क्योंकि प्राणिमात्र तुम्हारे 'वाच्य स्वरूप-श्रीविग्रह' में सेवा-अपराध करते हुए भी आपके "वाचक स्वरूप-नाम" का उच्चारण करने के साथ ही अपराध शून्य होकर भगवत्-प्रेमानन्द में विभोर हो जाते हैं। आपका 'वाच्य स्वरूप-श्रीविग्रह' चिदानन्द आकार है और श्रीकृष्णनामादि आपका 'वाचक' स्वरूप है, यह दोनों स्वरूप ही असीम हैं। तब भी हम लोगों के लिए वाच्य स्वरूप "श्रीभगवान" से उनका वाचक स्वरूप - "श्री भगवन्नाम" अधिक कृपालु है क्योंकि जीव उनका संग कर सकता है। जीव शब्द का संग तो कर सकता है किन्तु शब्द द्वारा जो उदिष्ट अथवा निर्दिष्ट है - अर्थात् शब्द जिसको उद्देश्य अथवा निर्देश करता है उनका संग करना साधारण व्यक्ति के लिए सम्भव नहीं। इसलिए यह स्पष्ट है कि श्रीभगवान के वाच्य स्वरूप से उनका वाचक स्वरूप अधिक उदार है। नामी से भी नाम अधिक उदार है। यद्यपि नाम और नामी Identical (अभिन्न) हैं yet the aspect of name is more gracious to us than the named.

श्री मद् भक्तिदयित माधव गोस्वामी महाराज