(परमाराध्यतम् श्री गुरु महाराज जी द्वारा बहुत वर्ष पूर्व जालन्धर सम्मेलन के सुअवसर पर दिया गया प्रवचन)
शास्त्रों में नाम को साक्षात् चिन्तामणि कहा गया है। जिस प्रकार चिन्तामणि से व भगवान से जो कुछ मांगा जाए, वही मिल जाता है। उसी प्रकार हरिनाम से भी हर वस्तु प्राप्त की जा सकती है। "नाम चिन्तामणि" से भी जो कुछ माँगा जाए मिल जाता है। नाम का भी स्वरूप है, विग्रह है, मूर्ति है। वह चैतन्य रस की मूर्ति है। चिन्मय मतलब ज्ञानमय व आनन्दमय रस की मूर्ति है, जो कि पूर्ण है। नाम खण्ड वस्तु नहीं है। श्रीहरिनाम संसार में प्रकट होने पर भी ठीक उसी प्रकार शुद्ध हैं, नित्य हैं, व मुक्त हैं, जैसे भगवान जब दुनिया में प्रकट होते हैं, तब माया से आबद्ध नहीं होते। भगवान का स्वरूप भी निर्गुण है। परन्तु हम भगवान को जो अपनी तरह देखते हैं, उसका कारण है अधिकार योग्यता (Angle of Vision)। बहुत व्यक्ति आंखों में चश्मा पहने हुए हैं। जिसका जिस रंग का चश्मा होता है वह उसी रंग का सब कुछ देखता है व उसी रंग का कहता है। कोई व्यक्ति झूठ नहीं कहता। परन्तु वास्तव में बात झूठी हो रही होती है। कारण, जिस माध्यम से वे व्यक्ति देख रहे हैं, वह माध्यम रंगीन है। जिसका जैसा चश्मा है वह वैसा ही रंगीन देखता है। जिसके चश्मे में कोई रंग नहीं है वह वास्तव में यथार्थ
देखता है। तामसिक, राजसिक अथवा सात्विक अर्थात् गुणमय भाव से जो व्यक्ति "वस्तु” का दर्शन करते हैं, वह "निर्गुण वस्तु” को देख कर भी उसे गुणमय कहेंगे, क्योंकि उनका चश्मा ही गुणमय है। भगवान के नाम का चिन्मय स्वरूप है, परन्तु उसे देखने के लिए जो योग्यता चाहिए, वह योग्यता हम में नहीं है। भगवान राम, कृष्ण स्वयं भगवान हैं, सर्वेश्वर हैं। जब वे दुनिया में प्रकट हुए तो उन्हें अनन्त प्राणियों ने देखा। परन्तु सभी उनको स्वयं भगवान नहीं समझ सके। भगवान को भगवान समझने के लिए जो योग्यता चाहिए, वह योग्यता हर एक व्यक्ति में नहीं है। मगधराज जरासन्ध विष्णु पूजन करता था, परन्तु कृष्ण को नहीं पहचान सका। श्रीकृष्ण से जरासन्ध ने लड़ाई की। लाखों-करोड़ों व्यक्तियों ने भगवान को न समझने के कारण भगवान से युद्ध किया। यदि भगवान हमारी आँखों के सामने भी आकर खड़े हो जाएँ, तो जो योग्यता भगवान को समझने के लिए हम में चाहिए उसके अभाव में हम उन्हें नहीं समझ सकेंगे।
श्रीमद् भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
अमृत वर्षा