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बड़ों से विनम्र होकर बात करें

जब महाभारत का युद्ध शुरू हुआ, तब अर्जुन ने पितामह भीष्म के रथ के पास तीर छोड़ा, फिर दूसरा तीर छोड़ा गुरु द्रोणाचार्य के रथ के पास, और फिर ऐसे ही कृपाचार्य के रथ के पास। द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म कहते हैं - " कोई भी काम करने से पहले बड़ों का आशीर्वाद लेना चाहिए!" तो अपने नए तरीके से इस प्रकार तीर छोड़कर अर्जुन ने गुरुजनों के चरणों में  प्रणाम किया है। अर्जुन के प्रणाम करने पर उन्होंने दिल से आशीर्वाद दिया - "विजयी भव:!"  प्रणाम करने का इतना फायदा होता है! दूसरी ओर, जब युद्ध शुरू हुआ तो दुर्योधन गुरु द्रोणाचार्य के पास गया और कटाक्ष करते हुए बोला - "पाण्डुपुत्रों की विशाल सेना को देखिये, जिसे आपके ही प्रतिभाशाली शिष्य द्रुपद के पुत्र ने युद्ध के लिए कुशलतापूर्वक सुसज्जित रूप से संगठित किया है।"

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर टीका में लिखते हैं कि दुर्योधन कटाक्ष में बोलता है - "तुम जैसा मूर्ख मैंने देखा नहीं, तुमको पता था यह जो द्रष्टद्युम्न है, वह प्रकट हुआ है तुम्हें मारने के लिए, फिर भी तुमने इसे युद्ध कला की शिक्षा दी! यह तुम्हारे कम दिमाग का परिचय है। तुम्हारे कारण ही हम इतनी मुश्किल में हैं। एक तरफ अर्जुन और युधिष्ठिर हैं जो कोई भी कार्य करने से पहले गुरु जनों को प्रणाम करते हैं और दूसरी तरफ दुर्योधन है जो गुरु जनों पर कटाक्ष करता है। इसका परिणाम यह रहा कि जिन्होंने प्रणाम किया वे विजयी हुए और जिन्होंने कटाक्ष किया न उनका राज्य रहा, न भाई बंधु रहे और न ही दुर्योधन रहा! इसीलिए भगवत गीता के प्रारंभ में ही दूसरा श्लोक हमें यह शिक्षा दे रहा है कि बड़ों से कटाक्ष वाली भाषा में बात नहीं करनी चाहिए, बल्कि बड़ों से विनम्र होकर बात करनी चाहिए। तभी हम अपने जीवन में सफल हो सकते हैं।

स्वामी बी. वी. विष्णु
17 मई 2024
श्री चैतन्य गौड़िय मठ, दिल्ली