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श्रील गुरुदेव की अंतिम वाणी, दिव्य लीलामृत ग्रन्थ से

"यह मनुष्य जन्म अत्यंत दुर्लभ है, और भगवान् का भजन करना ही इसका एकमात्र उद्देश्य है। भगवान् का भजन करने का वास्तविक अर्थ होता है, उनके द्वारा दिए गए निर्देशों का यथावत् पालन करना। कई योनियों में भ्रमण करने के बाद हमें यह मनुष्य जन्म प्राप्त हुआ, किन्तु हमें अपने पिछले जन्मों का स्मरण नहीं है।

 जलजा नव-लक्षाणि, स्थावरा लक्ष-विंशति, कृमयो रूद्र-संख्यकः |
 पक्षिणाम दश-लक्षणं, त्रिंशल्लक्षाणि पशवः, चतुर्लक्षाणि मानवः ||

(श्रीविष्णु पुराण)

'जलचर प्राणी ९ लाख प्रकार के हैं। वृक्ष और अन्य पौधों की २० लाख योनियां हैं। कीटों और सरीसृपों की ११ लाख प्रजातियां और पक्षियों की १० लाख प्रजातियां हैं। ३० लाख प्रकार की पशु योनियां और मात्र ४ लाख प्रकार की मनुष्य योनियां हैं। इस प्रकार, हमें ८० लाख अलग-अलग योनियों में भ्रमण करने के बाद मनुष्य जन्म प्राप्त होता है।'

इतना ही नहीं, इस बहुमूल्य मानव जन्म को हम किसी भी क्षण खो सकते हैं। इसलिए, श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती ठाकुर प्रभुपाद कहा करते थे-जीवों का परम और एकमात्र कर्तव्य है कि वे अपने नित्य-कल्याण के लिए प्रयास करें।

लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः |
तूर्णं यतेत न पतेदनुमृत्यु याव-
न्निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात् ||

(श्रीमद्भागवतम् ११/९/२९)

'असंख्य योनियों में भ्रमण करने के बाद, हमें यह दर्लभ मानव जन्म प्राप्त हुआ है। मानव देह नश्वर होते हए भी भगवान की सेवा करने एवं जीवों के चरम-उद्देश्य को स्थायी रूप से प्राप्त करने का सर्वोत्तम अवसर प्रदान करता है। इसलिए, एक बुद्धिमान व्यक्ति बिना किसी विलम्ब के अपने सर्वोत्तम नित्य-कल्याण के लिए प्रयास करेगा, क्योंकि वह जानता है कि अन्य सभी जन्मों में हम अनित्य सांसारिक वस्तुओं को लाभ कर सकते हैं, जो अत्यंत दुःख का ही कारण बनती हैं, किन्तु उन जन्मों में वास्तविक मंगल संभव नहीं है।'

हम अपनी मूर्खता के कारण इस भौतिक जगत् की बाहरी चमक को देखकर मोहित हो जाते हैं। किन्तु यदि हम अपनी आँखें बंद कर लेते हैं अथवा यदि हमारी दृष्टि नष्ट हो जाती है, तो क्या हम देख पाएंगे? अन्य सभी इन्द्रियों की क्षमता भी इसी प्रकार से है। ऐसी इन्द्रियों का क्या मूल्य है? भगवान् और उनके पार्षदों को हमारी भौतिक इन्द्रियों द्वारा नहीं समझा जा सकता है।

अतः श्रीकृष्ण-नामादि न भवेद् ग्राह्यं इन्द्रियैः |

सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः ||

(श्रीभक्ति रसामृत सिंधु पूः विः २/१०२)

'भगवान् का नाम, रूप, गुण, लीला आदि भौतिक इन्द्रियों के ज्ञान से परे हैं। भगवान् की सेवा के लिए उन्मुख भक्तों की अप्राकृत इन्द्रियों पर वे सब स्वयं ही स्फुरित हो जाते हैं।'

दूसरों को दोष न दें। किसी भी जीव के प्रति हिंसा भाव न रखें। दूसरों के द्वारा उत्पीड़ित होने पर भी एक सच्चा साधु अपनी सहनशीलता और दयालुता को नहीं छोड़ता। साधु सदा भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा में रत रहते हैं। भगवान् की संतुष्टि ही उनका एकमात्र उद्देश्य है। इस प्रकार के वास्तव साधु के संग में रहकर हरिभजन करें, तभी आपको वास्तविक फल मिलेगा, और आपका यथार्थ मंगल होगा।"